दीपावली स्पेशल कविताएँ || यह कविताएँ एक बार जरुर पढ़े || Deepawali Special Poems || दीवाली पर कविता || हैप्पी दीपावली ||
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| Happy Dipawali |
नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का साहित्य ट्यूबर (Sahitya Tuber) में, दोस्तों दीपावली का त्यौहार नजदीक है इस पावन त्यौहार पर आप सभी को बहुत-बहुत सुभकामनाए ! आपके जीवन में दीपावली के दियो की तरह हमेशा उजाला रहे और आप हमेशा हस्ते-मुस्कराते रहें!
दोस्तों इस त्यौहार को आपके लिए और भी मजेदार बनाने हम लेकर आ चुके है आप सभी के लिए दीपावली की कुछ चुनिन्दा कविताए ! जो कई महान जवीयो की कलमों से लिखीं गयीं हैं!
ये प्रकाश का अभिनन्दन है
अंधकार को दूर भगाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ
शुद्ध करो निज मन मंदिर को
क्रोध-अनल लालच-विष छोडो
परहित पर हो अर्पित जीवन
स्वार्थ मोह बंधन सब तोड़ो
जो आँखों पर पड़ा हुआ है
पहले वो अज्ञान उठाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशिओं के दीप जलाओ
जहाँ रौशनी दे न दिखाई
उस पर भी सोचो पल दो पल
वहाँ किसी की आँखों में भी
है आशाओं का शीतल जल
जो जीवन पथ में भटके हैं
उनकी नई राह दिखलाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ
नवल ज्योति से नव प्रकाश हो
नई सोच हो नई कल्पना
चहुँ दिशी यश, वैभव, सुख बरसे
पूरा हो जाए हर सपना
जिसमे सभी संग दीखते हों
कुछ ऐसे तस्वीर बनाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ
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| अरुण मित्तल |
दीपावली आई
दीपों का त्योहार दीवाली।
खुशियों का त्योहार दीवाली॥
वनवास पूरा कर आये श्रीराम।
अयोध्या के मन भाये श्रीराम।।
घर-घर सजे , सजे हैं आँगन।
जलते पटाखे, फ़ुलझड़ियाँ बम।।लक्ष्मी गणेश का पूजन करें लोग।
लड्डुओं का लगता है भोग॥
पहनें नये कपड़े, खिलाते है मिठाई ।
देखो देखो दीपावली आई॥
दीवाली हम सदा एसे मनाएं
कहा उस ने
आओ प्रिये दीवाली मनाएं
अपने संग होने की
खुशियों में समायें
आओ प्रिये दीवाली मनाएं
हाथ पकड़
दिए के पास लाई
जलाने को जो उसने लौ उठाई
तभी देखा
दूर एक घर
अंधेरों में डूबा था
बम के धमाके से
ये भी तो थरराया था
आँगन में उनके
करुण क्रन्दन का साया था
पड़ोस डूबा हो जब अन्धकार में
तो घर हम अपना कैसे सजाएँ
तुम ही कहो प्रिये
दीवाली हम कैसे मनाएं?
कर के हिम्मत उसने
एक फुलझडी थमाई
लाल बत्ती पे गाड़ी पोछते
उस मासूम की
पथराई ऑंखें याद आई
याचना के बदले मिला तिरस्कार
पैसों के बदले दुत्कार
घर में जब गर्मी न हो
वो पटाखे कैसे जलाये
जब है खाली उसके हाथ
हम फुल्झडियां कैसे छुडाएं ?
तुम ही कहो प्रिये
दीवाली हम कैसे मनाएं ?
जब खाया नही
तो दूध कहांसे आए
छाती से चिपकाये बच्चे को
सोच रही थी भूखी माँ
मिठाइयों की महक से
हो रही थी और भूखी माँ
खाली हो जब पेट अपनों के
कोई तब जेवना कैसे जेवे
अब तुम ही कहो प्रिये
दिवाली हम कैसे मनाएं?
भरी आँखों से
देखा उसने
फ़िर लिए कुछ दिए ,पटाखे मिठाइयां
संग ले मुझको
झोपडियों की बस्ती में गई
हमारी आहट से ही
नयन दीप जल उठे
पपडी पड़े होठ मुस्काए
सिकुड़ती आंतों को
आस बन्धी
अंधियारों में डूबा बच्पन
आशा की किरण से दमक उठा
अमावस की काली रात में
जब प्रसन्नता की दामिनी चमक उठी
तो अब आओ प्रिये
दीवाली हम खुशी से मनाये
सुनो न
दीवाली हम सदा एसे मनाएं
– रचना श्रीवास्तव
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| कविता श्रीवास्तव |
साथी, घर-घर आज दिवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
फैल गयी दीपों की माला
मंदिर-मंदिर में उजियाला,
किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
हास उमंग हृदय में भर-भर
घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
आँख हमारी नभ-मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,
दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
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| हरिवंशराय बच्चन |
आओ मिलकर दीप जलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं
रह न जाय अँधेरा कहीं घर का कोई सूना कोना
सदा ऐसा कोई दीप जलाते रहना
हर घर -आँगन में रंगोली सजाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.
हर दिन जीते अपनों के लिए
कभी दूसरों के लिए भी जी कर देखें
हर दिन अपने लिए रोशनी तलाशें
एक दिन दीप सा रोशन होकर देखें
दीप सा हरदम उजियारा फैलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.
भेदभाव, ऊँच -नीच की दीवार ढहाकर
आपस में सब मिलजुल पग बढायें
पर सेवा का संकल्प लेकर मन में
जहाँ से नफरत की दीवार ढहायें
सर्वहित संकल्प का थाल सजाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं.
– कविता रावत
दीपों का त्यौहार
गणपति गणना कर रहे, सरस्वती के साथ |
लक्ष्मी साधक सब दिखें, सबको धन की आस ||
ज्ञान उपासक कम मिले, खोया बुद्धि विवेक |
सरस्वती को पूजते, मानव कुछ ही एक||
लक्ष्मी वैभव दे रहीं, वाहक बने उलूक |
दोनों हाथ बटोरते, नहीं रहे सब चूक ||
अविनाशी सम्पति मिले, हंसवाहिनी संग |
आसानी से जो मिले, छेड़े आगे जंग ||
लक्ष्मी हंसा पर चलें, ऐसा हो संयोग |
सुखमय भारत देश हो, आये ऐसा योग ||
जन जन में सहयोग हो, देश प्रेम का भाव |
हे गणेश कर दो कृपा, पार करो अब नाव ||
हम सबकी ये प्रार्थना, उपजे ज्ञान प्रकाश |
दीपों के त्यौहार में, हो सबमें उल्लास ||
दीवाली मुबारक हो
भई कैसा है उजियारा जब कि अमावस काली आई
बोले आकाश से पटाखे धरती पे दीवाली आई
नासमझी में चाशनी कढ़ाई से लार क्यों टपकाये
सजधज के बहुत, मिठाई से भरी वो थाली आई
दीये की ज्योति में भाव बदले रंग बदले ज़माने के
जीवन था बेरंग कितना, अब गालों पर लाली आई
क्यों सब थे नाराज, बैठे गाल फुलाये जब
दीपों से दीप जले तो घर में खुशहाली आई
बेसुध थी रात कुछ भान ओढ़ने का किसको?
अब नथनी नाक में और कानों में बाली आई
फैके हम पर निगाह फुरसत न थी घरवाली को
“ दीवाली मुबारक हो ! ” कहती हुई साली आई
– हरिहर झा
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